
आधी रात होने को आयी
फ़िर भी… पल्कों पर नीन्द ना आयी…
जितनी भी इस नादान दिल को समझाने की कोशिश करूँ
फ़िर भी… वोह हमारे काबू में ना आयी…
जितनी भी बातें मे उनसे करूँ
फ़िर भी… मन कि प्यास बुजती ही नहीं…
उनके एक झलक के लिए इतना तरस रहीं हूँ
फ़िर भी… हमसे उन्की मुलाकात होती नहीं…
जितनी भी बार घडी की ओर देखूँ
फ़िर भी… उनके बगैर वक्त गुज़रती ही नहीं…
एक ही छत के नीचे है अब हम दोनों
फ़िर भी… साथ में पिया नहीं…
इन्तज़ार ही तो कर सकती हूँ उन्के
फ़िर भी… और कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं…
फ़िर भी… पल्कों पर नीन्द ना आयी…
जितनी भी इस नादान दिल को समझाने की कोशिश करूँ
फ़िर भी… वोह हमारे काबू में ना आयी…
जितनी भी बातें मे उनसे करूँ
फ़िर भी… मन कि प्यास बुजती ही नहीं…
उनके एक झलक के लिए इतना तरस रहीं हूँ
फ़िर भी… हमसे उन्की मुलाकात होती नहीं…
जितनी भी बार घडी की ओर देखूँ
फ़िर भी… उनके बगैर वक्त गुज़रती ही नहीं…
एक ही छत के नीचे है अब हम दोनों
फ़िर भी… साथ में पिया नहीं…
इन्तज़ार ही तो कर सकती हूँ उन्के
फ़िर भी… और कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं…

